
ईद की शाम हाजी एक लिफ़ाफ़ा पकड़े चले आए। लिफ़ाफ़े पर दवा की दुकान का नाम देख मैंने पूछा, ‘क्या हुआ हाजी? सब ख़ैरियत?’ हाजी का पहला शब्द डकार के साथ बाहर निकला, ‘अमां महाकवि! क्या बताऊं! हफ़्ते भर से इफ़्तार खा-खा कर पेट का फ़ीफ़ा वर्ल्ड कप बन गया है। अब जिसके यहां न जाओ, वो बुरा मान जाए।’ मैंने कहा, ‘अमां यार ये तो अच्छी बात है। एक-दूसरे के धर्मों के त्योहार में शामिल तो होना ही चाहिए। यही तो हिन्दुस्तान की खूबसूरती है।’
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